बचपन का घर

बचपन का घर
बचपन का घर | Bachpan Ka Ghar Banner
बचपन का घर

आज बचपन का घर बहुत याद आ रहा 
चलो चलते हैं

बहुत दिनों बाद अपने बचपन के घर पहुँचा
सब कुछ पहले जैसा ही था
और फिर भी कुछ पहले जैसा नहीं लग रहा था 

वही दीवारें, वही कमरे, वही आँगन, वही छत
बस वो एक आँगन का पेड़ नहीं था 

वही बरसों पुराना कुआँ, वही रोशनदान से आती हवा
बस वो सौंधी सी महक नहीं थी 

गांव हमेशा की तरह बहुत शांत था 
पर इस बार वो हमेशा वाला सुकून नहीं था 

स्कूल में वो शहतूत का पेड़ तो था 
पर उसके नीचे शहतूत तोड़ने वाले बच्चों की भीड़ ना थी

रात में आसमान में टिमटिमाते तारे तो थे 
पर हाथ वाला पंखा झलती, कहानी सुनाती दादी ना थीं

वही मटका, वही मथनी, वही दूध, वही दही,
पर रोज़ सुबह मक्खन निकालने वाली नानी ना थीं

घर की छत पर कड़कड़ाती धूप तो थी
मगर उसमें सूखता कोई अचार नहीं था 

जिन पेड़ की डालियों पर झूले डालते थे 
अब ना वो झूले हैं और ना ही वो पेड़ 

जिन तालाबों में शाम को दोस्तों संग 
डुबकी लगाया करते थे 
ना तो अब वो तालाब हैं और ना ही वो दोस्त 

अब तो गांव से भी शहर की बू आने लगी है
गांव… गांव जैसा नहीं रहा 
और शहर सारे एक जैसे ही दिखने लगे हैं 

अब वो बीता बचपन कहाँ ढूँढू 
ना अब वो गांव में बस्ता है 
और ना ही शहर में 

जब गांव भी सब शहर जैसे हो जाएंगे 
तब कहाँ जाएंगे
उस बीते हुए बचपन को ढूंढने…

मानस समीर मुकुल

सही मायनों में ये ना ही कविता हैं ना ही गद्य, पर कुछ है…अगर आप तक पहुंचे तो अपने विचार ज़रूर बताएं

I would love to hear your feedback on this poem. Do share in the comments section. You can read other poems here.

If you love my poetry I recently published my first Poetry book – ‘You, Me & The Universe’ – Poems on the Conspiracies of the Universe. You can order the book and find more details HERE

I co-facilitate a poetry workshop – Soul Craft Poetry Workshop. If you are interested then please do check out our Facebook and Instagram page.

You may also like...

14 Responses

  1. Rashi says:

    Bahot pyari kavita 👌👌 Wo beeta hua bachpan ab shayad hi kahin mile. Loved your poem, brings out the melancholy so beautifully.

  2. Shraddha Mukul says:

    Very honest and close to heart

  3. Pooja says:

    Bahut khoob likha hain Manas. Wo bachpan, wo dost, wo apni shahar ki galiyan…sab yaad aate hain jab wo sab bichad jaate hain…

    • Manas Mukul says:

      Bahut shukriya Pooja ji. Thank you so much for the appreciation. Keep visiting keep reading

  4. Ruchi Nasa says:

    Dil ko choo Liya is kavita ne.. bahut khoob likhi hai!

    • Manas Mukul says:

      Thank you so much for the appreciation Ruchi ji 🙏🏽🙏🏽🙏🏽 thank you again

  5. Preeti says:

    Very emotional poem. We can’t bring back our bygone days. Lot of pathos.❤❤👌

    • Manas Mukul says:

      Thank you so much Preeti ji. I am glad you could relate to the piece. Thanks again 😊🙏🏽👍🏽

  6. This poem is pure nostalgia. Your every line took me back to my dadi’s village. Matka, Mathni, Makhana, Talab, ped, kuan…
    How the people and life use to be so simple.. the concrete and deforestation has snatched the sukoon and calm from villages.
    Beautiful weave of poem, more power to your pen.

    • Manas Mukul says:

      Thank you so much for the appreciation. I am glad I was able to take you down the nostalgic lane. Thanks for visiting and reading 👍🏽😊🙏🏽

Love your feedback!

%d bloggers like this: