आख़िर तू है कौन?

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तू राधा नहीं,
तू रुक्मणी नहीं,
तो आख़िर तू है कौन?

तेरा प्यार आधा भी नहीं,
तेरी दोस्ती अधूरी भी नहीं,
तो आख़िर तू है कौन?

क्या सब कुछ कह देने से,
ही सब कुछ होता है?
या बिना कुछ कहे भी,
सब पूरा होता है।

एक का प्यार अधूरा,
पर मिलन पूरा,
एक के पास वो होके भी,
सब कुछ अधूरा…

तू अर्धांगिनी नहीं,
तू संगिनी नहीं,
तो आख़िर तू है कौन?

तू मीरा नहीं,
तू सखी नहीं,
तो आख़िर तू है कौन?

तू शक्ति नहीं,
तू भक्ति नहीं,
तो आख़िर तू है कौन?

तू यमुना नहीं,
तू कालिंदी नहीं,
तो आख़िर तू है कौन?

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फिर भी तू क्यूं हर जगह,
प्रारंभ भी तू,
अंत भी तू,
आदि भी तू,
अनंत भी तू,
मुझमें भी तू,
सब में भी तू,
तो आख़िर तू है कौन?

मानस ‘समीर’ मुकुल

“I’m taking my blog to the next level with Blogchatter’s My Friend Alexa – #MyFriendAlexa.” 

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5 Responses

  1. Shwetanshu Srivastava says:

    Nice

  2. Very contemplative ! More power to your imagination & creative writing. Loved it.

  3. Jyoti Jha says:

    This is compulsively a soul-stirrer! Very beautiful poem with profound meaning!

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